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आज/ कल

9 Nov 2020

आज वो फिर आया
पांव को ज़ोर ज़ोर से ठोक कर
करता हुआ एलान
घुस गया बेधड़क
स्कूल में
जानता था वो
कि कोई नहीं रोकेगा उसे

रौंदता गया अनगनित सपनों को
अपनी बंदूक की नोंक से
फिर देखा एक तिरछी नज़र से मेरी तरफ
और ज़ोर से किया अट्टाहास
क्षण भर के लिए
कांप उठी ये धरती
गिरने लगे मकान
जल गयी घास
आ गया भूकंप

लगा कुछ वक़्त संभलने में
होश आया
तो मैंने एक
समझदार, शिक्षित,
दिमाग से पूरी तरह प्रबल
नागरिक का कर्तव्य निभाया
अपना ध्यान वहाँ से हटा कर
धूप का चश्मा चढ़ाया
कार के काले शीशे बंद किये
पहले से तेज़ रेडियो को और तेज़ किया
और घर आई

चाय पी
खाना बनाया
घूमने गयी
फ़ेसबुक पर
गुस्से में दो फॉर्वर्ड भी किए
और निश्चिंत हो
सो गई

सुबह
जब बच्चों को स्कूल के लिए
उठाने गयी
तो पता नहीं कब और कैसे
रात भर में उनकी आँखें
आईने में तब्दील हो चुकी थीं

मैं अवाक्, स्तब्ध
कि तभी उन आंखों ने किया
कल से भी बड़ा अट्टाहास
पर इस बार
नहीं गिरा कोई मकान
घास ने जलने से कर दिया इंकार
धरती भी खडी रही अपनी जगह
पर मैं
अपनी ही नज़रों में
थोड़ी-सी गिरी
पर मैं
फिर से
थोड़ी-सी मरी

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Readers' comments

Brajesh Krishna

14 Nov 2020

Author

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति। भावपू्र्ण, सशक्त कविता।

Shikha Gupta

11 Nov 2020

Author

Great work! Look forward to more :)